कवयित्री: सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता का स्वर: देशभक्ति, समर्पण और त्याग
सारांश: 'मातृ-मंदिर की ओर' सुभद्रा कुमारी चौहान की एक ओजस्वी और राष्ट्रभक्ति से पूर्ण कविता है। इस कविता में कवयित्री अपनी मातृभूमि को एक 'मंदिर' और स्वयं को उसकी 'अनजान संतान' मानती हैं। भारत माता की पराधीनता और पीड़ा को देखकर कवयित्री का हृदय अत्यंत व्यथित (दुखी) है। वे मातृ-मंदिर में जाकर अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपने प्राण भी बलिदान करना चाहती हैं। कविता में स्वतंत्रता संग्राम के मार्ग में आने वाली बाधाओं और कठिनाइयों का भी वर्णन किया गया है।
शब्दार्थ: व्यथित = दुखी/पीड़ित; हृदय-प्रदेश = मन; पद-पंकज = कमल रूपी चरण; नयन-जल = आँखों के आँसू; मातृ-मंदिर = मातृभूमि रूपी मंदिर।
प्रसंग: इस पद्यांश में कवयित्री अपनी मातृभूमि (भारत माता) की पराधीनता से दुखी होकर उनके दर्शन करने की इच्छा व्यक्त कर रही हैं।
भावार्थ: कवयित्री कहती हैं कि अपनी मातृभूमि को पराधीन (गुलाम) और कष्ट में देखकर मेरा हृदय अत्यंत दुखी और व्याकुल (व्यथित) है। इसलिए मैं आज अपने मन को बहलाने के लिए भारत माता के पास जाना चाहती हूँ। मैं अपनी माँ को अपने सुख-दुख बताना चाहती हूँ ताकि मेरे हृदय का सारा बोझ हल्का हो जाए। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी भारत माता के कमल रूपी पवित्र चरणों (पद-पंकज) को पकड़कर उन्हें अपने आँखों के आँसुओं (नयन-जल) से नहला दूँ। इसलिए मैंने अपने मन में यह निश्चय किया है कि आज मैं अपनी मातृभूमि रूपी मंदिर (मातृ-मंदिर) में जाकर अपनी भारत माता के दर्शन करूँगी।
शब्दार्थ: दीन = असहाय/गरीब; दुर्गम = जहाँ पहुँचना कठिन हो; बाधक = रुकावट डालने वाले; पहरेदार = ब्रिटिश शासन के सिपाही; सोपान = सीढ़ियाँ; दुर्बल = कमज़ोर।
प्रसंग: यहाँ कवयित्री स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों (ब्रिटिश शासन के अत्याचार) का वर्णन करते हुए ईश्वर से सहायता माँग रही हैं।
भावार्थ: मातृ-मंदिर जाने का विचार करते ही कवयित्री को अचानक यह ध्यान आता है कि मैं तो एक बहुत ही असहाय, छोटी और अनजान संतान हूँ। मुझे मातृभूमि को आज़ाद कराने का यह कठिन (दुर्गम) रास्ता नहीं पता। इसलिए वे भगवान से प्रार्थना करती हैं कि हे ईश्वर! तुम्हीं मुझे मातृ-मंदिर (आज़ादी) तक पहुँचने का सही मार्ग दिखाओ। कवयित्री ने सुन रखा है कि इस मार्ग में अंग्रेज़ी शासन के सिपाही (बाधक पहरेदार) कड़ी पहरेदारी कर रहे हैं और मातृ-मंदिर तक पहुँचने की सीढ़ियाँ (सोपान) बहुत ऊँची हैं। मेरे ये कमज़ोर पैर इन कठिनाइयों में फिसल रहे हैं। इसलिए हे भगवान! तुम मुझे साहस दो और इन सीढ़ियों पर चढ़ा दो ताकि मैं अपनी मातृभूमि के दर्शन कर सकूँ।
शब्दार्थ: अभिराम = अत्यंत सुंदर/आकर्षक; जय-राम = जय-जयकार की ध्वनि; सर्वस्व = सब कुछ; विश्राम = शांति का स्थान।
प्रसंग: कवयित्री को दूर से मातृ-मंदिर की ज्योति और जयकार सुनाई देती है, जिससे उनके अंदर वहाँ पहुँचने की आतुरता बढ़ जाती है।
भावार्थ: ईश्वर से प्रार्थना करते हुए जब कवयित्री आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें दूर से मातृ-मंदिर में जगमगाती हुई अत्यंत सुंदर (अभिराम) ज्योतियाँ दिखाई देती हैं। (यह ज्योति स्वतंत्रता की आशा और शहीदों के बलिदान का प्रतीक है)। उन्हें वहाँ से भारत माता की जय-जयकार (मधुर जय-राम) की ध्वनि भी सुनाई दे रही है। यह सब देखकर उनकी आतुरता बढ़ जाती है और वे भगवान (जीवन के राम) से प्रार्थना करती हैं कि मुझे जल्दी से वहाँ ले चलो। वे पूछती हैं कि मेरा वह सब कुछ (सर्वस्व) और मेरे मन की शांति (विश्राम) का स्थान कहाँ है? अर्थात् मातृभूमि ही उनका सब कुछ है और उसी की गोद में उन्हें परम शांति प्राप्त होगी।